मधुमोहिनी उपाध्याय एक सहज कवयित्री हैं....वे गुनगुना रही हैं इसका मतलब कि गीत में हैं। कोई-न-कोई रस का झरना अंदर झर रहा है। शब्द बूँद-बूँद बनकर जहाँ गिरते हैं, थिरकते हैं। रुदन भी स्फुरित होकर हँसने लगता है। अंतर्लय ध्वन्यात्मक हो जाती है। आँख में ठहरे हुए आँसू टप-टप कोरस गाते हैं। स्वर अपनी मिठास बढ़ाते हुए हृदय की ओर महायात्रा करने लगते हैं। मधुमोहिनी गीत रच रही हैं। मधुमोहिनी गीत गा रही हैं। अत्यधिक विषाद के गीत, अत्यधिक उल्लास के और परिहास के भी।

::  डा॰ अशोक चक्रधर ::

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मधु जी के

व्यवहार व काव्य में

मधुरता है

प्रेम उनकी कविता है

स्वर में मिठास है

ईश्वर में विश्वास है

कुल मिलाकर

मधु जी मोहिनी हैं

:: राजेश चेतन ::

http://rajeshchetan.com

 
   
 
   

 
   

कवयित्री श्रीमति मधुमोहिनी उपाध्याय को मैं बहुत समय से जानता हूँ। अनेक बार, मैंने उन्हें कवि-सम्मेलनों में काव्य-पाठ करते हुए सुना है और कितनी ही बार यत्र-तत्र पत्र-पत्रिकाओं में मैंने उनकी कविताएँ पढ़ी भी हैं। इन दिनों जो कुछ कवयित्रियाँ स्वयम् ही लिखती हैं, उनमें मधुमोहिनी का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। इनकी अनेक रचनाएँ एक सिद्धहस्त लेखनी का जादू बिखेरती हुई लगती हैं। मुझे विश्वास है कि इनकी रचनाएँ काव्य के क्षेत्र में बड़े आदर और सम्मान के साथ ग्रहण की जायेंगी।

:: गोपालदास नीरज ::

 
   

 
         
 

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