:: सरस्वती - वन्दना ::


 शब्द दीपकों से तेरी आरती उतारती

 

तोल के ही बोल बोलूं , बोलूं तो शहद घोलूं

घोलूं नेह बिन्दु भव-सिन्धु से उबार दे।

प्रेम के ही तार जोड़ूं , द्वेष की दीवार तोड़ूं

गाते संसार छोड़ूं तार दे मां तारे दे ।

विपदा में धीर धरूं दुःखियों की पीर हरूं

नेह का ही नीर भरूं, सबको बहार दे ।

साधिका हूँ तेरी माँ आराधिका हूँ तेरी माता

शरण में आगई हूँ शारदे मां प्यार दे ॥

 

नेह से निहारा तूने , स्वर को सुधारा तूने

कण्ठ भी संवारा तूने, वाणी भी संवारती ।

जड़ता विषमता उपजती जो मानस में

दूर कर तुरत ही तम से उबारती ।

मनन सफल हुआ सृजन सफल हुआ

जीवन सफल साधना से हुआ भारती।

हर लो प्रमाद रोम-रोम में भरो प्रसाद

शब्द दीपकों से तेरी आरती उतारती॥

 
   
 
 
     
     
     
 

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