:: अधरों पे मुरली-सी काहे नहीं धरते ::


तन में तरंग उठी, उर में उमंग उठी

नेह की छुअन अंग-अंग में समाई है,

लगती सुहानी प्रात, रात करती है बात

सुध-बुध खोई ऐसी मुरली बजाई है

गूँजते हैं बोल अनमोल, मन डोलता है

चैन तो चुराया, मोरी निंदिया चुराई है

तोड़ के न जाना, मुख मोड़ के न जाना, मुझे

छोड़ के न जाना जब पकड़ी कलाई है

 

कोमल कलाई मोरी, बाँकी चितवन तोरी

देखे चोरी-चोरी श्याम क्या है तेरे मन में

देख के अकेली-सँग कोई न सहेली
तूने
पकड़ी हथेली बरजोरी करे वन में

छेड़ो न कन्हाई होगी जगत् हँसाई ऐसी

प्रीत है जगाई झन्कार उठे तन में

मुरली बजाई और पकड़ी कलाई है तो

रास भी रचाएँ चलो आज मधुवन में

 

मीठे-मीठे बोल तेरे मिसरी सी घोल, मेरे

लाज-पट खोल कानों में हैं रस भरते

मदभरे नैन तेरे छीने सुख चैन मेरे

बीते दिन रैन, दुःख टारे नहीं टरते

साँवला सलोना रूप उपमा नहीं अनूप

 
 
     
   
 
     
 
 

ऐसी मुस्कान मानों मोती हों बिखरते

फूँकते ही प्रान मैं तो रागिनी बनूँगी तेरी

अधरों पे मुरली-सी काहे नहीं धरते 

 

बंद करूँ नैन, रूप साँवला-सलोना दिखे

खुलते ही आँख उड़ जाते कहाँ खन में

यमुना में गंध बसी, ब्रज में सुगन्ध बसी

तेरी ही सुगन्ध बसी बहती पवन में

बाँसुरी की तान में ही बसते हैं मानों प्रान

बावरी बनाया मुझे तेरी चितवन ने

उर में बसाया तुम्हें, सुर में सजाया तुम्हें

तुम ही बसे हो कान्हा राधिका के मन में

 
 
 
 

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