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अधरों पे मुरली-सी
काहे नहीं धरते
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तन
में तरंग उठी, उर में उमंग उठी
नेह
की छुअन अंग-अंग में समाई है,
लगती
सुहानी प्रात, रात करती है बात
सुध-बुध खोई ऐसी मुरली बजाई है
गूँजते हैं बोल अनमोल, मन डोलता है
चैन
तो चुराया, मोरी निंदिया चुराई है
तोड़
के न जाना, मुख मोड़ के न जाना, मुझे
छोड़
के न जाना जब पकड़ी कलाई है
कोमल
कलाई मोरी, बाँकी चितवन तोरी
देखे
चोरी-चोरी श्याम क्या है तेरे मन में
देख
के अकेली-सँग कोई न सहेली
तूने
पकड़ी हथेली बरजोरी करे वन में
छेड़ो
न कन्हाई होगी जगत् हँसाई ऐसी
प्रीत है जगाई झन्कार उठे तन में
मुरली बजाई और पकड़ी कलाई है तो
रास
भी रचाएँ चलो आज मधुवन में
मीठे-मीठे बोल तेरे मिसरी सी घोल, मेरे
लाज-पट खोल कानों में हैं रस भरते
मदभरे नैन तेरे छीने सुख चैन मेरे
बीते
दिन रैन, दुःख टारे नहीं टरते
साँवला सलोना रूप उपमा नहीं अनूप |