:: नैन में बैन में, प्रात में रैन में ::


राधा को कृष्ण का नेह मिला

कृष्ण पे राधा की थी परछाईं

भाँवर रुक्मिणी संग पड़ीं पर

भाव ने राधा से किन्हीं सगाई

भाग्य बड़े ब्रज गोपिन के सँग

रास किया, हरि लीला दिखाई

वेगि हरो हर ताप यहाँ प्रभु

जानें सभी तुम्हरी प्रभुताई

 

वैसी नहीं मथुरा नगरी बृज-

भूमि ने मानों सुधि बिसराई

मैल मिले मन में, जल में मल

की ही मिले परती अब छाई

दानवता का ही ताण्डव है यहाँ

मानवता चहुँ ओर लजाई

स्वार्थ ने भक्ति औ भाव तजे, धरो

चक्र सुदर्शन प्यारे कन्हाई

 

फाग कहाँ अब राग कहाँ

अनुराग को खोजते-खोजते हारे

हाय ! सखा हैं कहाँ तुमसे

अति दीन, मलीन सुदामा बिचारे

देख सके न वसन्त बहार जो

 
 
     
   
 
     
 
 

जीने से भी पहले गए मारे

लीला दिखाओ तुम्हीं अपनी, लिए

काल ने लील सखा तव प्यारे

 

बाबा नंद की देखो दशा तो

अँसुअन-नद में बाढ़ बढ़ेगी

जसुदा की व्यथा सुनि के

भृकुटी तव तीर कमान चढ़ेगी

सन्तति ऐसी हुई अब तो इक-

दूजे के ही सर दोष मढ़ेगी

विश्व-विजय तब होगी प्रजा जब

संस्कृति के कुछ पाठ पढ़ेगी

आँखें फटीं जब देखी-सुनी

विधवाओं की दर्द-भरी वो कहानी

दो रुपया, मुट्ठी भर चावल

से बस पेट की आग बुझानी

जाप के नाम पे ताप मिला, कहाँ

जाएँ, हो जिनको भूख मिटानी

दारुण दृश्यों को देख के कान्हा

क्यों नहीं आपने भृकुटी तानी

 

धर्म के नाम पे शोषण है यहाँ

कोई नहीं तुमसे डरता है

बेबस, व्याकुल, वक़्त की मारी का

संकट टारे नहीं टरता है

ऐसी कथाओं से ही नर-नारी का

वज्र हृदय भी भरा करता है

कैसे नारायण हो सब देख के

नैनों से नीर नहीं झरता है

 

नेह की चाह, सनेह की चाह

बढ़े तो बताऊँ तुम्हें बस कान्हा

ताप बढ़े, संताप बढ़े, दुख-

दर्द सुनाऊँ तुम्हें बस कान्हा

गीत में, गान में, छन्द में, तान में

डूब के गाऊँ तुम्हें बस कान्हा

नैन में बैन में, प्रात में रैन में

स्वप्न में पाऊँ तुम्हें बस कान्हा

 
 
 
 

मुख्य पृष्ठ | कृतियां | अपनों की नज़र में | अपनी विशेष सूची में जोड़ें | सम्पर्क

 

परिचय | गीत | मुक्तक | छन्द | कविता | व्यंग्य रचनायें | व्यंग्य गीत | ग़ज़ल | चित्र दीर्घा  | मित्र को बतायें | अपने विचार लिखें | प्रैस

 

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2006 | इ-मेल: mail@madhumohini.com