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जीने
से भी पहले गए मारे
लीला
दिखाओ तुम्हीं अपनी, लिए
काल
ने लील सखा तव प्यारे
बाबा
नंद की देखो दशा तो
अँसुअन-नद में बाढ़ बढ़ेगी
औ’
जसुदा की व्यथा सुनि के
भृकुटी तव तीर कमान चढ़ेगी
सन्तति ऐसी हुई अब तो इक-
दूजे
के ही सर दोष मढ़ेगी
विश्व-विजय तब होगी प्रजा जब
संस्कृति के कुछ पाठ पढ़ेगी
आँखें फटीं जब देखी-सुनी
विधवाओं की दर्द-भरी वो कहानी
दो
रुपया, मुट्ठी भर चावल
से
बस पेट की आग बुझानी
जाप
के नाम पे ताप मिला, कहाँ
जाएँ, हो जिनको भूख मिटानी
दारुण दृश्यों को देख के कान्हा
क्यों नहीं आपने भृकुटी तानी
धर्म
के नाम पे शोषण है यहाँ
कोई
नहीं तुमसे डरता है
बेबस, व्याकुल, वक़्त की मारी का
संकट
टारे नहीं टरता है
ऐसी
कथाओं से ही नर-नारी का
वज्र
हृदय भी भरा करता है
कैसे
नारायण हो सब देख के
नैनों से नीर नहीं झरता है
नेह
की चाह, सनेह की चाह
बढ़े
तो बताऊँ तुम्हें बस कान्हा
ताप
बढ़े, संताप बढ़े, दुख-
दर्द
सुनाऊँ तुम्हें बस कान्हा
गीत
में, गान में, छन्द में, तान में
डूब
के गाऊँ तुम्हें बस कान्हा
नैन
में बैन में, प्रात में रैन में
स्वप्न में पाऊँ तुम्हें बस कान्हा |