:: प्रीत गयी मीत गया हाय ! संगीत गया ::


नाम नहीं लिया मैंने अधरों को सिया मैंने

लागे नहीं जिया इसे कैसे समझाऊँ मैं

देह में सुगन्ध भरी जीते जी हैं हाय ! मरी

विरह में जरी गरी कौन गली जाऊँ मैं

रूप न सिंगार कहीं दिखती बहार नहीं

रार नहीं प्यार नहीं सपने में पाऊँ मैं

पाती न संदेश प्रिय गए कौन देश मेरे,

उलझे हैं केश इन्हें काहे सुलझाऊँ मैं

 

दूर रहने को मजबूर हैं ज़रूर पर

माँग का सिंदूर कहता है चले आइये

बिंदिया न भाये मोहे निंदिया न आये

रैन चैन नहीं लाये मीठे बैन तो सुनाइये

छन्द-गीत गाये मैंने सुर भी सजाये मैंने

आप मोहिनी सी कोई तान छेड़ जाइये

दरस को परस को हो गये अधीर नैन

बरस चुके हैं अब नेह बरसाइये

 

जब से सजन गए सुखद सपन गये

पिया बिन सखि हाय ! जिया नहीं जाये रे

ख़ुद में ही खोयी रहूँ जागकर सोयी रहूँ

बैरी दिन रात मोहे काहे तड़पाये रे

दर्द बेशुमार रहे आँसुओं की धार बहे

 
 
     
   
 
     
 
 

दिल का ग़ुबार कहे चैन नहीं आये रे

प्रीत गयी मीत गया हाय ! संगीत गया

छोड़ मनमीत गया गीत कौन गाये रे

 

देह में है प्रान आप नेह के वितान आप

मधुमय गान आप सुर संसार हैं

चेहरे का नूर आप नैन का सुरूर आप

जबसे हैं दूर आप छूटे त्यौहार हैं

सारी-सारी रात रोऊँ चार पल को जो सोऊँ

सपने में आके तड़पाते बार-बार हैं

प्रेम नदिया की बहे उलटी ही धार सखि

मैं तो इस पार हाय ! वे तो उस पार हैं 

 
 
 
 

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