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लिखो तो प्यार पर
लिखना
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ये
कहते हैं सभी मुझसे, लिखो तो प्यार पर लिखना
रँगी
है ज़िंदगी जिसने, उसी श्रृंगार पर लिखना
न जब
थे तुम, न थी वो धुन, न वो कविता, न वो गुनगुन
सजे
जो साज़ पर सुर में, उसी झंकार पर लिखना
मेरा
मन बावरा कहता है तुम पर ग्रन्थ रच जाऊँ
कलम
कहती है लिक्खो तो दुःखी संसार पर लिखना
जिन्होंने वक़्त के रहते सँवारी ज़िंदगी अपनी
सँवारा वक़्त ने उनको समय की धार पर लिखना
लिखो
उस पेड़ पर जो धूप में तपकर भी फल देता
झुकी
फूलों से, ख़ुशबू से महकती डार पर लिखना
जो
कुर्सी पर सजे हैं आज, कल क्या तों ख़ुदा जाने
तुम्हें उनसे है क्या लेना बस उनकी हार पर लिखना
जो
लिखना है तो सूरज, चाँद-तारों पर भी लिख जाना
धरा
को धारिणी शक्ति अटल आधार पर लिखना
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