:: बेटियाँ ::


आज खिली हैं इस आँगन में, चल देंगी कल द्वार से

चहक रहीं हैं आज न जाने, उड़ जाएं कब डार से

 

हाय ब्याह की रीत है ऐसी, अपना घर ही बना विदेसी

सीखी जिससे जीवन सरगम, दूर उसी झंकार से

 

किन-किन यत्नों से था पाला, अपना तन-मन-धन दे डाला

हाय ! विदा के संग विदा ली, खुशियों ने संसार से

 

हाय ! यही होता गठबन्धन, उर में रहता मेरे क्रन्दन

आर्त रुदन कितने सुनती हूँ क्रूर नियति के वार से

 

चहक रही थीं कल तक देखो व्याकुल हैं उस डार-पर

खिली-खिली थीं इस आँगन में मुरझाई पतझार से

 

जग में पूजित है जब नारी, भेदभाव फिर क्यों है भारी

डूब रही हैं हाय बचा लो कोई इन्हें मँझधार से

 
 
 
     
     
     
     
     
     
 
     
   
 
     
 

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