:: भाषा बौनी हुई ::


मुझको तो सचमुच कोई प्राणों से भी प्यारा है

है गंगाजल सा पावन पर लगता खारा है

 

कैसे शुरू करूं मैं उसकी बातें तो अनगिन हैं

मेरी धड़कन में बजती मीठी सी धुन निशिदिन है

मेरी मावस की रातों का वही एक तारा है

 

जब-जब उसका चित्र खींचने को लेखनी उठाई

भाषा बौनी हुई भाव भी कलम नहीं लिख पाई

हृदय महासागर है उसका मन निर्मल धारा है

 

लगता है सब छोड़-छाड़ उस पर ही ग्रन्थ लिखूं मैं

एक आत्मा हो अपनी बाहर से भिन्न दिखूं मैं

दिखने में औरों सा लेकिन सबसे न्यारा है

 

ईश्वर ने मुझ से खुश होकर के वरदान दिया है

उसको वरदात्री का ही प्रसाद, वर मान लिया है

इस जीवन में ही मुझको तो मिला किनारा है

 
 
 
     
     
 
     
   
 
     
 

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