:: छिला उसी का पाँव है ::


थककर बैठ न जाना राही, अभी न आया गाँव है

माना तपती धूप है जीवन, मिलती फिर भी छाँव है

धूप में जितना चल पाओगे, ख़ुद में उतना बल पाओगे

जो भी अमर हुआ है जग में, छिला उसी का पाँव है

 

आस निरास भरा जीवन है, हानि-लाभ तो आजीवन है

जीवन की चौसर पर सबका अपना-अपना दाँव है

 

ज्यों ज्यों सीढ़ी चढ़ जाओगे, सन्देहों के गढ़ पाओगे

जग का हर इक रिश्ता-नाता भ्रम-कागा की काँव है

 

जग में मोती चाहो पाना, गहरे सागर मथते जाना

संयम से जीवन में मिलता हर अभिलाषित ठाँव है

 
 

 

     
     
     
     
     
     
     
     
 
     
   
 
     
 

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