:: मेरे खारेपन को सफ़र ने निखारा ::


 वो सुहानी डगर वो सुहाना सफ़र

हमको याद आ गया वो पुराना सफ़र

आप दो चार पल चल दिये साथ में

बन गया इश्क़ का एक फ़साना सफ़र

 

सफ़र में हँसी है सफ़र में ख़ुशी है

सफ़र न हो तो ज़िंदगी ख़ुदकुशी है

सफ़र मुझको प्यारा , सफ़र ने संवारा

मेरे खारेपन को सफ़र ने निखारा

सफ़र याद आता, सफ़र मुस्कराता

न गाऊँ अगर तो सफ़र गुनगुनाता

मीत भी आप हैं प्रीत भी आप हैं

गीत से बन गया अब तराना सफ़र

 

सफ़र एक उलझन सफ़र ही है सुलझन

सफ़र ही तों मीठी यादों का दरपन

सफ़र के वो गाने बने हैं फ़साने

जिन्हें भूलने में लगेंगे ज़माने

वो जंगल में मंगल वो रेतीली राहें

भुला न सकेंगे भुलाना जो चाहें

दूर जाते हैं हम पास आते हो तुम

हमको लगता है कुछ कुछ दीवाना सफ़र

 
 
     
   
 
     
 
 

वो एक दूसरे को खिलाकर के खाना

तो कुछ पल को लगता था वैरी ज़माना

वो ठंडी हवाएं वो बांहों के झूले

वो सांसों की ख़ुशबु भुलाये न भूले

वो सुबह सफ़र की वो लाली सहर की

बहुत याद आती है अन्तिम पहर की

अब वो बातें कहां अब वह रातें कहां

मीठी यादों का बस है ख़ज़ाना सफ़र

 

सफ़र जिंदगी की झलक ही दिखाता

सफ़र ही तो हर रोज़ गज़लें लिखाता

शहर में सफ़र सी न महकी हवा है

तो बहके हुओं की सफ़र ही दवा है

सफ़र में मुसाफिर से मिलती हैं राहें

ज़ुवाँ जो न कहती वो कह्तीं निगाहें

आप रूठे तो रूठी है राहें सभी

हमको लगता है अब तो बेगाना सफ़र

 
 
 
 

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