:: ये हमें हुआ तो हुआ है क्या? ::


मेरा मन ये चाहे लिखूँ नया, मगर आज कुछ भी नया है क्या?

वही दर्द है, वही आह है, अभी ख़ौफ़ दिल से मिटा है क्या?

 

न वो प्रीत है, न वो प्यार है, वही नफ़रतों की बयार है

वो जो घूमता था बहेलिया, यहाँ जाल उसका बिछा है क्या?

 

कहीं रास्ते नहीं सूझते, कहीं ज़िन्दगी से हैं जूझते

मिले जन्म फिर से मनुष्य का, भला हमने ऐसा किया है क्या?

 

कई रूप हैं, कई रंग़ हैं, यहाँ सबके अपने ही ढंग हैं

सभी गुम हैं अपने आप में, ये हमें हुआ तो हुआ है क्या?

 

मेरे साथ वे भी हैं चल रहे, जो क़दम-क़दम पे हैं छल रहे

अब उन्हें कहूँ भी तो क्या कहूँ, कभी यूँ किसी ने कहा है क्या? 

 
 
 
     
     
     
     
     
     
     
     
 
     
   
 
     
 
     
     
 

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