:: मधुमास हो तुम ::


ज्योतित कर दे अन्तर्मन को, अक्षय अमित उजास हो तुम

देह, आत्मा तुम ही मेरे और मेरा हर श्वास हो तुम

 

मुझे तुम्हारी नेह दृष्टि में जन्मों का अनुराग दिखा

यूँ लगता है दिव्य कलम से विधि ने मेरा भाग लिखा

तृप्ति तुम्हीं, संतृप्ति तुम्हीं, संतप्त हृदय की प्यास हो तुम

 

जीवन में नव-गति, नव-लय, नव-तान, गीत, नव-छन्द हुए

ऐसा अनुपम मिलन हमारा, मानो अम्बर अवनि छुए

सुरभित कर दे रोम-रोम को, संतत सुखद सुवास हो तुम

 

श्लाघनीय जीवन हो अपना, सत्कृत्यों से मान मिले

मृत्यु अंक में ले जब हमको, अधरों पर मुस्कान खिले

यूँ तो ॠतुएँ हैं अनेक पर मनमोहक मधुमास हो तुम

 
 
 
     
     
     
     
     
     
 
     
   
 
     
 

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