:: एक पल बीते एक सदी सा ::


 मैंने तो तेरे संग बांधी अपनी जीवन डोर

काहे तोड़ गया चित चोर मोहे छोड़ गया चित चोर

 

एक पल बीते एक सदी सा मन में उठता वेग नदी सा

मैं तट के इस ओर खड़ी हूँ तू तट के उस ओर

 

मैं कितनी राते हूँ जागी निंदिया तो संग गई अभागी

बंद करूँ पलकें जैसे ही तू दिखता चहुँओर

 

सूनी-सूनी सारी रातें ख़ुद से ही करती हूँ बातें

आँखें तो ऐसे बरसी हैं ज्यों सावन घनघोर

 
 
 
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
 
     
   
 
     
 
   

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