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:: रिश्तों
में आज नहीं पहले-सा राग है
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अपनी
ही परछाईं, देती क्यूँ आग है
रिश्तों में आज नहीं पहले-सा राग है
सूखे
हैं सावन औ’
भादों भी सूखे
प्यासे हैं अनगिन औ’
अनगिन है भूखे
दीवाली अँधियारी, फीका-सा फाग है
कितनों के जीवन में हिम का प्रपात है
छायी
है धुन्ध, नहीं दीखता प्रभात है
डसता
यूँ कितनों को, जीवन का नाग है
जेठ
की दुपहरी ने अनगिनत जला दिए
खिलने से पहले ही क्योंकर कुम्हला दिए
निर्दोष होकर भी, आँचल में दाग है
गीतों में दर्द नहीं, रसविहीन छन्द हैं
वासन्ती गन्ध नहीं बाँटती सुगन्ध है
रखवाला बनकर ही, खा जाता बाग है
जीवन
का अर्थ नहीं अर्थ की उपासना
जीते-जी मार न दे भीतर की वासना
‘मोहिनी’-सी
काया में लग जानी आग है |