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गुरु-वंदना
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गुरुदेव तुम्हारी जय होवे।
प्राणी –
प्राणी निर्भय होवे॥
श्रद्धा से आंखे गीली हैं
पलकें अब अधिक सजीली है
मम
कलम चाहती है कहना
तव
नेह सिन्धु में ही बहना
कैसे
लिक्खूं क्या-क्या पाया
गुरु
ने जीवन-पथ दिखलाया
गुरुमंत्र ने जीवन –
दान किया
करुणानिधि ने वरदान दिया
प्रण
सम्पूरण निश्चय होवे।
गुरुदेव तुम्हारी जय होवे॥
जग
की विपदा ने जब घेरा
आकुल
होकर गुरु को टेरा
की
त्वरित कृपा दुःख दूर किये
संशय
–
भ्रम चकना चूर किये
जीवन
को नई दिशा दे दी
मावस
का तमस निशा ले ली
नवजीवन का संचार किया
निर्मल –
निश्छल ही प्यार किया
नव
छन्द गीत नव लय होवे ।
गुरुदेव तुम्हारी जय होवे॥
श्रद्धा होती है जब मन में
स्पन्दन सा होता तन में
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