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आत्मा तो थी पहले
से ही प्यासी
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बहुत
दिनों से उनका रूखा –
रूखा रुख
देख-
देख कर चित्त रहने लगा खिन्न
अवसाद के दिखायी देने लगे चिन्ह
चित्त में छाने लगी उदासी
आत्मा तो थी पहले से ही प्यासी
हम
संसार से ऊब रहे थे
भवसागर में डूब रहे थे
कि
अचानक तैरने की कला जागी
मन
होने लगा वैरागी
हमने
कलम को ऐसे थामा
जैसे
डूबते का पतवार
अब
तो मणियां उछालने लगा पारावर
अथाह
सागर पाया खारा
लेखनी ने उबारा
सागर
से मिली मणि थी ग़ज़ल
रत्न
थे मुक्तक गीत और छन्द
लेखनी बहने लगी स्वछन्द
भेड़
की खाल में छिपे भेड़ियों की खाल उतारती
डूबे
हुओं को तारती
खद्दर धारियों की धज्जियाँ उड़ाती
तीखे
–
तीखे व्यंग्य –
बाण छुड़वाती
पीड़ा
मुझे होती , कागज़ पर ये रोती
कहती
, जो कहना है, मुझसे कहो
पर
अहर्निश मेरे साथ काव्य गंगा में बहों
इसमें अवगाहन कर धुलेंगे पाप
दूर
होगा मनस्ताप
मुझसे ही बोलो, मुझमें हि रस घोलो
ऐसा
हो माधुर्य और स्वाद
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