18. मैं कहती दिल की धड़कन

 

19. प्रेम को समान क्यों नही माना?

 

20. भर देते हो शब्दों में अपना रंग

 

21. ये मन नहीं करता है मनन

 

22. मेरी कल्पनाओं के नायक

 

23. आत्मा तो थी पहले से ही प्यास

 

24. तम नहीं हो सका ख़तम

 

25. ये है मेरा अतीन्द्रिय प्यार

 

26. बड़ा फ़र्क है सन्तति और

सन्तान में

 

27. कमल का स्वभाव कलम से

कहना है

 
28. प्यार का आकार बौना हो गय  
29. राखियों के तार, तार-तार हो गए  
30. आस्था ना ढहे इस नये वर्ष में  
 
 

:: आत्मा तो थी पहले से ही प्यासी ::


बहुत दिनों से उनका रूखा रूखा रुख

देख- देख कर चित्त रहने लगा खिन्न

अवसाद के दिखायी देने लगे चिन्ह

चित्त में छाने लगी उदासी

आत्मा तो थी पहले से ही प्यासी

हम संसार से ऊब रहे थे

भवसागर में डूब रहे थे

कि अचानक तैरने की कला जागी

मन होने लगा वैरागी

हमने कलम को ऐसे थामा

जैसे डूबते का पतवार

अब तो मणियां उछालने लगा पारावर

अथाह सागर पाया खारा

लेखनी ने उबारा

सागर से मिली मणि थी ग़ज़ल

रत्न थे मुक्तक गीत और छन्द

लेखनी बहने लगी स्वछन्द

भेड़ की खाल में छिपे भेड़ियों की खाल उतारती

डूबे हुओं को तारती

खद्दर धारियों की धज्जियाँ उड़ाती

तीखे तीखे व्यंग्य बाण छुड़वाती

पीड़ा मुझे होती , कागज़ पर ये रोती

कहती , जो कहना है, मुझसे कहो

पर अहर्निश मेरे साथ काव्य गंगा में बहों

इसमें अवगाहन कर धुलेंगे पाप

दूर होगा मनस्ताप

मुझसे ही बोलो, मुझमें हि रस घोलो

ऐसा हो माधुर्य और स्वाद


 
 

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