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आत्मा तो थी पहले
से ही प्यासी
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जो
संतृप्ति दे निर्विवाद
वर्षों से व्यञ्जन खिला रही हो
पर
कुछ मिला ?
शिक़ायतों का चलता रहा सिलसिला
इसलिए उसे ही खिलाओ, उसे ही पिलाओ
उसे
ही सुनो , उसे ही सुनाओ
उसे
ही गाओ , उसे ही गुनगुनाओ
जिसने दी है गुनगुनाने की कला
भला
उसने कभी छला ?
जब-जब जो मांगा , दिखा नहीं पर दिया
जगमगाने लगा भाग्य का दिया
समझो
सोचो और लिखो
पर
उसी के रंग में रंगी दिखो
सोचो
कहाँ थी , कहाँ आ गई , कहाँ जाना हैं ?
क्या
कभी खुद को पहचाना हैं ?
क्या
है गन्तव्य ?
क्या
है मन्तव्य ?
लगा
दो सारा समय ख़ुद को संवारने में
मुझको निखारने में
लिखो
छन्द मुक्तक गीत एवं व्यंग्य रचनाएं
तो
पीड़ा नहीं देंगी प्रवंचनाएं
न
होगी संसार से आशा
न
असारता से निराशा
न
अपने पन की अपेक्षा
न
परायेपन भरी उपेक्षा
न
मिलन का सुख
न
बिछुड़न का दुःख
न
संयोग में स्पन्दन
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