18. मैं कहती दिल की धड़कन

 

19. प्रेम को समान क्यों नही माना?

 

20. भर देते हो शब्दों में अपना रंग

 

21. ये मन नहीं करता है मनन

 

22. मेरी कल्पनाओं के नायक

 

23. आत्मा तो थी पहले से ही प्यास

 

24. तम नहीं हो सका ख़तम

 

25. ये है मेरा अतीन्द्रिय प्यार

 

26. बड़ा फ़र्क है सन्तति और

सन्तान में

 

27. कमल का स्वभाव कलम से

कहना है

 
28. प्यार का आकार बौना हो गय  
29. राखियों के तार, तार-तार हो गए  
30. आस्था ना ढहे इस नये वर्ष में  
 
 

:: मेरी आत्मिक सन्तति ::


एक दिन वे मुझे चिढ़ाने लगे

सच कहूँ तो मेरी खिल्ली उड़ाने लगे

कि अब नहीं हो सकती तुम्हारे

 कोई भी सन्तान

यही है प्रौढ़ावस्था की पहचान

मां बनना तो है अब असम्भव

मैने कहा सम्भव

वे बोले कैसे ? देखतीं नहीं अपनी उम्र ?

मैने कहा ताउम्र

मेरे भीतर तो अभी भी हलचल रहती है

या कहूँ कि किसी के पलने और विकलता

से बाहर निकलने की अनुभूति

हर पल रहती है

भले ही प्रौढ़ हूँ पर मन तो

बच्चों सा निर्मल , निश्छल है

और मेरे भीतर की युवती मां बनने को विकल है

धरा पर आने के लिए मांसमज्जायुक्त

अस्थिपुंज नहीं , ज्योतिपुंज आतुर है

व्यर्थ ही आपका  मन चिन्तातुर है

वैसे भी ये अवस्था तो है शरीर की

या कहूँ कि माटी की लकीर की

जिसे माटी में ही मिल जाना है

पर इस अवस्था में जन्मी काव्य कलिकाओं

को ही जीवित रह जाना है

वैसे भी आपने केवल शरीर का ही धर्म बताया

भौतिक जीवन का मर्म बताया

शरीर असमर्थ है तो क्या ?

आत्मा तो समर्थ है


 
 

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