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मेरी आत्मिक सन्तति
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जो
पल –
पल आकुल है
अमर
सन्तति को जन्म देने के लिए
व्याकुल है
चूंकि आत्मा अमर है इसलिए इसकी
सन्तति भी अमर होगी
शरीर
की मृत्यु के बाद मेरी आत्मिक
सन्तति ही मेरे जीवन का
प्रथम पहर होगी
इसी
चिन्तन मनन में समय
चलता
रहा
मेरे
भीतर कुछ-कुछ पलता रहा
नौ
माह मुझे प्रजनन की विचित्र
पीड़ा
रही
उनकी
दृष्टि में रही ये मनः स्थिति
बालसुलभ क्रीड़ा रही
पाँच
माह रहा असहनीय दर्द
अनभिज्ञ रहे मेरे हमदर्द
और
ये वेदना गर्भ में नहीं
उठी
थी सीने के अन्दर
मानों भीतर हिलोरें ले रहा हो
भावों का समन्दर
जन्माष्टमी पर लिया था कृष्ण ने अवतार
उसी
दिन मेरे आंगन में महकी काव्य कलिकाओं
एवं
सुमनों ने किया मेरा उद्धार
सागर
मंथन में मिले थे रत्न
आत्म
मंथन में फलीभूत हुए मेरे प्रयत्न
धरा
पर जैसे –
जैसे होता था इनका आगमन
वैसे
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वैसे होता था अज्ञान एवं मोह का बहिर्गमन
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