18. मैं कहती दिल की धड़कन

 

19. प्रेम को समान क्यों नही माना?

 

20. भर देते हो शब्दों में अपना रंग

 

21. ये मन नहीं करता है मनन

 

22. मेरी कल्पनाओं के नायक

 

23. आत्मा तो थी पहले से ही प्यास

 

24. तम नहीं हो सका ख़तम

 

25. ये है मेरा अतीन्द्रिय प्यार

 

26. बड़ा फ़र्क है सन्तति और

सन्तान में

 

27. कमल का स्वभाव कलम से

कहना है

 
28. प्यार का आकार बौना हो गय  
29. राखियों के तार, तार-तार हो गए  
30. आस्था ना ढहे इस नये वर्ष में  
 
 

:: मेरी आत्मिक सन्तति ::


सृष्टा की ये अद् भुत सृष्टि थी

क्योकिं मुझपर उनकी विशेष कृपा दृष्टि थी

फलतः ऐसे विचारों को जन्म देने के लिए

उसने मुझे चुना

मैने भी अन्तरात्मा से जनित पीड़ा को सुना

साधारण प्रसव के बाद थम जाती है वेदना

शिशु को मिलता है नव संसार , नव चेतना

पर आत्मिक सन्तति के जन्म के बाद भी

कम नहीं होता दर्द

क्योंकि धूमिल करती है मन दर्पण समाज की गर्द

कभी पीड़ादायी  होता है अत्याचार ,  कभी दुराचार

कभी भयग्रस्त करता है आतंक

कभी विचार बहते है निश्शंक

कभी कारण बनते है गरीबी , बेकारी , शोषण

तो कभी द्रवित करता है कुपोषण

कभी बेबस करती है बेपर्दगी

तो कभी विवश करती है दरिन्दगी

कभी कारण बनता है तिरस्कार

तो कभी हतोत्साहित करता है अपकार

कभी व्यथित करता है विवाद

तो कभी घेर लेता है अवसाद

कभी संतप्त करते हैं ईर्ष्या द्वेष ज्वलन

तो कारक होते है प्रतिशोध प्रज्ज्वलन

कभी क्षुब्ध करती है प्रवंचनाएं

तो कभी मुक्ति चाहती है वर्जनाएं

कभी व्यथित करता है एकान्त

तो कभी अकारण मन हो जाता है क्लान्त

कभी दुःसह हो जाती हैं वेदनाएं


 
 

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