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प्यार का आकार बौना
हो गया
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जब
समेटा था सगे-सम्बन्धियों में प्यार को
प्यार का आकार दिन-दिन और बौना हो गया
किन्तु आश्रय लेखनी का पा लिया जब हाथ ने
एक
ही चादर जगत् इक ही बिछौना हो गया
लेखनी चलती ही रहना
बात
सबके मन की कहना
झाँककर महलों में देखा प्रेम का ना अंश पाया
आर्तजन की याचना ने मर्मभेदी दंश पाया
विवश-सी फिर लेखनी रोती रही दिन-रात ही
अनगिनत जीवन अमावस पूर्णिमा ना प्रात ही
महल
वालों से न कहना
भावनाओं में न बहना
यूँ
कभी मन की उड़ानें कल्पना के पंख पातीं
चाहतीं उड़ना मगर वे दूसरे क्षण लौट आतीं
और
फिर धिक्कारतीं, झकझोर देतीं मर्म को
बोलतीं क्यूँ भूल जाती ‘मोहिनी’
कवि-कर्म को
दाह
में दिन-रात दहना
जग-व्यथा अनवरत कहना
लेखनी की इस व्यथा को कब, कहाँ, किसको सुनाऊँ ?
राह
में कितनी रुकावट अब कहाँ, किस ओर जाऊँ ?
तोड़ने से भी न टूटे माँ इसे अवलम्ब देना
है
तुम्हीं से आस अब तो बल इसे अविलम्ब देना
कण्ठ
में झरने सी झरना
गीत
में
‘मधु’
भाव भरना
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