18. मैं कहती दिल की धड़कन

 

19. प्रेम को समान क्यों नही माना?

 

20. भर देते हो शब्दों में अपना रंग

 

21. ये मन नहीं करता है मनन

 

22. मेरी कल्पनाओं के नायक

 

23. आत्मा तो थी पहले से ही प्यास

 

24. तम नहीं हो सका ख़तम

 

25. ये है मेरा अतीन्द्रिय प्यार

 

26. बड़ा फ़र्क है सन्तति और

सन्तान में

 

27. कमल का स्वभाव कलम से

कहना है

 
28. प्यार का आकार बौना हो गय  
29. राखियों के तार, तार-तार हो गए  
30. आस्था ना ढहे इस नये वर्ष में  
 
 

:: धरती का स्वर्णिम ताज हो ::


नव-वर्ष की नव-रश्मि से

ज्योतित अखिल संसार हो

मन-वचन-कर्म समान हों

सबसे ही निश्छल प्यार हो

 अनुराग से अनुराग मिलकर

एक अभिनव राग हो

घर-घर में दीवाली मने

मन में वसन्ती फाग हो

 हम शोक, चिन्ता छोड़कर

निज कर्म में तल्लीन हों

निज भक्ति पर विश्वास हो

जग के न सम्मुख दीन हों

 है लेखनी की चाह मेरी

हर कली खिलती रहे

हों साधनाएँ पूर्ण सब

वह शक्ति भी मिलती रहे

 निज संस्कृति, निज धर्म से

भारत का जग में राज हो

यह दिव्य पुरुषों की धरा

धरती का स्वर्णिम ताज हो

 हम देश से, निज वेष से

जग को दिखें बस भारती

भारती-माँ की उतारें

आओ मिलकर आरती

 है आरती सच्ची वही

जिसमें कि कातर भाव हो

पर दुक्ख पीड़ा दूर करने

का हृदय में चाव हो

 समदर्शिता सम-भाव से

भारत में जन-उत्कर्ष हो

हों कृत्य भी ऐसे हमारे

जिनसे विधि को हर्ष हो


 
 
     
   
 
     

मुख्य पृष्ठ | कृतियां | अपनों की नज़र में | अपनी विशेष सूची में जोड़ें | सम्पर्क

 

परिचय | गीत | मुक्तक | छन्द | कविता | व्यंग्य रचनायें | व्यंग्य गीत | ग़ज़ल | चित्र दीर्घा  | मित्र को बतायें | अपने विचार लिखें | प्रैस

 

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2006 | इ-मेल: mail@madhumohini.com