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धरती का स्वर्णिम
ताज हो
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नव-वर्ष की नव-रश्मि से
ज्योतित अखिल संसार हो
मन-वचन-कर्म समान हों
सबसे
ही निश्छल प्यार हो
अनुराग से अनुराग मिलकर
एक
अभिनव राग हो
घर-घर में दीवाली मने
मन
में वसन्ती फाग हो
हम
शोक, चिन्ता छोड़कर
निज
कर्म में तल्लीन हों
निज
भक्ति पर विश्वास हो
जग
के न सम्मुख दीन हों
है
लेखनी की चाह मेरी
हर
कली खिलती रहे
हों
साधनाएँ पूर्ण सब
वह
शक्ति भी मिलती रहे
निज
संस्कृति, निज धर्म से
भारत
का जग में राज हो
यह
दिव्य पुरुषों की धरा
धरती
का स्वर्णिम ताज हो
हम
देश से, निज वेष से
जग
को दिखें बस भारती
भारती-माँ की उतारें
आओ
मिलकर आरती
है
आरती सच्ची वही
जिसमें कि कातर भाव हो
पर
दुक्ख पीड़ा दूर करने
का
हृदय में चाव हो
समदर्शिता सम-भाव से
भारत
में जन-उत्कर्ष हो
हों
कृत्य भी ऐसे हमारे
जिनसे विधि को हर्ष हो
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