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प्रेम सहज कान्ति
देता है
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ढाई
अक्षर प्रेम जगत् में है जीवन आधार
जीवन
के तारों को झंकृत करता यही सितार
कितनी परिभाषाएं इसकी कितना है विस्तार
फिर
भी पार न पाया कोई सचमुच प्रेम अपार
प्रेम नहीं था जब जीवन में तब निराश होते थे
सतत्
कर्म में लीन प्रेम बिन पर हताश होते थे
यूं
तो सब सुख थे जीवन में पर हाँ प्रेम नहीं था
सोते-जगते रटूँ निरन्तर ऐसा नेम नहीं था
पर
अब जो निधि मिली मुझे उसका तो मोल नहीं है
वाणी
जिसको कहना चाहे ऐसा बोल नहीं है
प्रेम शक्ति देता जीवन को प्रेम शान्ति देता है
नहीं प्रसाधन इसे चाहिए सहज कान्ति देता है
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