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ये मन नहीं करता है
मनन
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जब
शुरु हुआ है गायत्री मन्त्र का जाप
दूर
जा चुका है मनस्ताप
विश्वास ही नहीं हर श्वास ये कह्ता है
कि
हर समस्या का समाधान उसी के पास रहता है
फिर
भी ये चंचल मन बार बार न जाने क्यूँ
दुनिया की दुत्कार सहता है
सद्
बुद्धि समझाती है
जीने
का मार्ग दिखाती है
ऐसा
नहीं कि जानता नहीं ये मन
पर
नहीं करता है मनन
संसार में चिर शान्ति !
बहुत
बड़ी है भ्रान्ति
इसलिए जहाँ –
जहाँ जुड़ता है, जब जब मुड़ता है
या
हवा के संग उड़ता है
तो
हो जाता है धराशायी
क्या
संसार सुख दे सकता है चिरस्थायी ?
टूटता है , बिखरता है
सद्
बुद्धि के सान्निध्य में फिर निखरता है
काश
! ये टूटन चुभन जलन घुटन से
ऊपर
उठ जायें
जीवन
संवारने में जुट जाए
न
करे आलाप । न प्रलाप
न
स्नेह के लिए अनुरोध न अप्राप्ति पर विरोध
सुने
अन्तर्मन की पुकार
दूर
हो जाएंगे विकार
स्थिर हो जाएंगे विचार
जीवन
होगा मुदित
आत्मा होगी प्रमुदित
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