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मेरे सात पति
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मैंने
सात विवाह किए हैं और
मेरे
सातों पति इस धरती के दैदीप्यमान दिए हैं
क्या
आप हतप्रभ है ? क्यूँ
क्या
पुरुष बलांत हरण कर सकता है ?
तो
स्त्री स्वेच्छा से वरण नहीं कर सकती है ?
पुरुष को यदि पर स्त्री प्रिय हो सकती है
तो
उसकी स्त्री भी अन्य किसी का हिय हो सकती है
विवाह तो देह से अधिक आत्मा का बन्धन है
जिसमें ढाई अक्षर का अक्षर अनुबन्धन है
विवाह तो दो आत्माओं को एकाकार करता है
न कि
स्वेच्छाचार करता है
विवाह तो हृदय से हृदय का संवाद है
विवाह की पावनता तो निर्विवाद है
विवाह तो कली का फूल से साहचर्य पाकर
खिलना, खिलाना, खिलखिलाना एवं
सुरभित होना है एक होकर अनेक हार पिरोना है
विवाह तो अग्नि को साक्षी मानकर लिया गया संकल्प है
विवाह का विवाह ही विकल्प है
विवाह अर्थात् गृहस्थ तो सभी आश्रमों में शीर्षस्थ है
सच्चा गृहस्थ सन्यासी से भी उच्चस्थ है
विवाह पाणिग्रहण नहीं वाणीग्रहण भी है
विवाह तो प्रकृति की पुरुष को विचित्र देन है
विवाह तो त्याग है न कि लेन है
विवाह नवयुगल का नवजीवन है
विवाह संजीवनी है संजीवन है
विवाह तो भेद नहीं अभेद करता है
विवाह तो जीवन पथ के गडढों , खाइयों के छेद भरता है
विवाह तो सृजनहार का मानव को सर्वोत्तम उपहार है
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