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प्रेम को समान
क्यों नही माना?
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ऐसा
एक बार नहीं अनेक बार लगता है
मानों कोई अपना ही बार-बार ठगता है ।
उन्हें न तो कभी था, न है, न ही कभी होगा हमसे प्यार
तो
ढाई अक्षर कैसे बने हमारी रचना का आधार
हमारे इस चिन्तन पर सिंचन करता है मन
बुद्धि मनन, पर कहता है अन्तर्मन
कि
जब कुछ भी तुम्हारे हाथ में नहीं
तो
क्यूं बड़े –
बड़े बोल बोलती हो
लिखती हो, अक्सर सातवें आसमान पर दिखती हो।
चाहती हो आसमान पाना ?
तो
प्रेम को समान क्यों नही माना?
मित्र सम्बन्धी घर परिवार
क्या
यहीं तक सीमित है प्यार ?
ऐसी
क्षुद्र मानसिकता को है धिक्कार
प्यार जितना विस्तार पाएगा
उतना
ही सुरीला सितार बजाएगा
इसलिए संकीर्ण मानसिकता छोड़ो
सम्पूर्ण धरा से रिश्ता जोड़ो
सुधारो संवारो वर्तमान
वही
भविष्य में बनेगा तुम्हारी पहचान
मृत्यु जब लेगी अंक में
जीवन
का इतिहास नहीं रहेगा पंक में
पंकज
की तरह बिखेरेगा सुवास
मृत्यु के बाद भी जीवित रहेगा मधुमास
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