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ये है मेरा
अतीन्द्रिय प्यार
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भौतिक विपन्नता से साधन सम्पन्नता से
स्वच्छन्दता या संयमन से इन्द्रियों के दमन से
पीड़ा
या दुःख से इन्द्रिय जनित सुख से
लाभ
या हानि से पश्चाताप या ग्लानि से
मानवीय रिश्तों से अलभ्य है किश्तों से
युद्ध या शान्ति से संभावना या भ्रान्ति से
अनीति या नीति से सामाजिक रीति से
अन्त
या आरम्भ से अनन्त है प्रारम्भ से
यंत्र या तंत्र से साधित है मंत्र से
विग्रह या निग्रह से प्रमुदित है अनुग्रह से
सुनने या कहने से बढ़ता है बहने से
जीत
या हार से भिन्न है संसार से
टूटन
या चुभन से निर्लिप्त है भुवन से
देह
या गेह से परे है सन्देह से
सर्वथा भिन्न है क्योंकि आत्मा अभिन्न है
मौन
जब सर्वाधिक बोलता है
निःशब्द होकर भी रस घोलता है
तब
प्रारम्भ होता है आत्मा से आत्मा का संवाद
जो
संतृप्ति देता है निर्विवाद
देह
से परे हो जाती है देही
जब
मिल जाता है परम सनेही
झंकृत हो उठते है हृततन्त्री के तार
प्रेम पा जाता है गगन सा विस्तार
आत्मा से आत्मा का जब होता है साक्षात्कार
दिव्य लगने लगता है ये संसार
ये
बावरी बन नाचने लगती है , अपनी
भाग्य लिपि मानों अक्षर-अक्षर बांचने लगती है
बार-बार गाती है, अहर्निश गुनगुनाती है
कि
ढाई अक्षर अक्षर रहे आने वाली पीढ़ी अनन्त प्रेमगाथा कहे।
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