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भर देते हो शब्दों
में अपना रंग
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मन
कहता है कि दिन - रात करो भजन
पर
अन्तर्मन कहता है कि सृजन भी तो है भजन
और
सचमुच मैने पाया कि सृजन करते समय
तुम
मुझमें भर देते हो नई उमंग नई तरंग
शब्दों में अपना रंग
कर
देते हो चित्रकारी
उतरती हैं रचनाएं प्यारी-प्यारी
सुनो
सृजनहार! मुझे तुम्हारी सर्जना से है
बेहद
प्यार
बनना
चाहती हूँ तुम्हारी अनुचरी
अन्तरात्मा में है आस्था गहरी
इसलिए गहराई तक जाना चाहती हूँ
संसार सागर की थाह पाना चाहती हूँ
तुम
सहायक रहे तो मिल जाएँगे रत्न
सफलीभूत हो जाएँगे प्रयत्न
शब्दरुखी –
रत्नों से बनाऊँगी काव्यालंकार
जो
अलंकृत करेंगे जीवन एवं वंश का उद्धार ।
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