18. मैं कहती दिल की धड़कन

 

19. प्रेम को समान क्यों नही माना?

 

20. भर देते हो शब्दों में अपना रंग

 

21. ये मन नहीं करता है मनन

 

22. मेरी कल्पनाओं के नायक

 

23. आत्मा तो थी पहले से ही प्यास

 

24. तम नहीं हो सका ख़तम

 

25. ये है मेरा अतीन्द्रिय प्यार

 

26. बड़ा फ़र्क है सन्तति और

सन्तान में

 

27. कमल का स्वभाव कलम से

कहना है

 
28. प्यार का आकार बौना हो गय  
29. राखियों के तार, तार-तार हो गए  
30. आस्था ना ढहे इस नये वर्ष में  
 
 

:: तम नहीं हो सका ख़तम ::


वर्षो से मना रही हूँ दिवाली

पर नहीं हो सका मेरे जीवन में ज्ञान का प्रकाश

और तम का नाश

ऐसा लगता है तम आलिंगन के लिए

फैलाए खड़ा है अपना बाहुपाश

तम नहीं हो सका ख़तम

हृदय में छटपटाहट है , अकुलाहट है

सम्बन्धों की कड़वाहट है और घबराहट है

मानों हर पल किसी अज्ञात अनिष्ट की आहट है

ये विकलता विह्वलता क्यों?

बढ़ने लगी ज्यों की त्यों ।

कभी मन हो जाता है अशान्त

कभी कलान्त

जाने कब आयेगी स्थिरता

जायेगी अधीरता

चाहतीं नहीं कमज़ोर होना

पल पल आकुल होना

पर लगता है मेरी भक्ति की शक्ति की

परीक्षा है यह

या अज्ञात प्रियतम की प्रतीक्षा है यह

काश! कोई तो समझाए

जिससे मनस्ताप जाए

कलम कुछ तो सार्थक चिरस्थायी छाप जाये

बस शरीर ही जाये जीवन बच जाये

बार बार क्यूं मांगू दुनिया से

अपनेपन की भीख?

स्वयं ही सशंकित क्या दे सकेंगे सीख?

पर सीखना होगा शास्त्र ज्ञान से


 
 

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