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तम नहीं हो सका ख़तम
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वर्षो से मना रही हूँ दिवाली
पर
नहीं हो सका मेरे जीवन में ज्ञान का प्रकाश
और
तम का नाश
ऐसा
लगता है तम आलिंगन के लिए
फैलाए खड़ा है अपना बाहुपाश
तम
नहीं हो सका ख़तम
हृदय
में छटपटाहट है , अकुलाहट है
सम्बन्धों की कड़वाहट है और घबराहट है
मानों हर पल किसी अज्ञात अनिष्ट की आहट है
ये
विकलता विह्वलता क्यों?
बढ़ने
लगी ज्यों की त्यों ।
कभी
मन हो जाता है अशान्त
कभी
कलान्त
जाने
कब आयेगी स्थिरता
जायेगी अधीरता
चाहतीं नहीं कमज़ोर होना
पल
–
पल आकुल होना
पर
लगता है मेरी भक्ति की शक्ति की
परीक्षा है यह
या
अज्ञात प्रियतम की प्रतीक्षा है यह
काश!
कोई तो समझाए
जिससे मनस्ताप जाए
कलम
कुछ तो सार्थक चिरस्थायी छाप जाये
बस
शरीर ही जाये जीवन बच जाये
बार
–
बार क्यूं मांगू दुनिया से
अपनेपन की भीख?
स्वयं ही सशंकित क्या दे सकेंगे सीख?
पर
सीखना होगा शास्त्र ज्ञान से
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