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तम नहीं हो सका ख़तम
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याद
रखना होगा पूर्वजों को ध्यान से
न कि
मिथ्या अभिमान से
आत्मा कहती है कि जो दूर
जाना
चाहता है उसे जाने दो
चिरस्थायी विचार निर्बाध गति
से
आने दो
कलम
को बहने दो
याचना रहने दो
याचक
नहीं दाता बनों
अभिनव गीतों की उदगाता बनो
ढेर
विषय हैं रचने के लिए
आकुलता से बचने के लिए
बड़ा
अभिमान था ख़ुद पर कि
जुड़ती नहीं हो , मुड़ती नहीं हो
क्या
चाहती हो सुनना, कहना, बहना
या
सदैव जीवित रहना
चाहती हो जीवित रहना तो सुनो –
सुनो
अन्तर्रात्मा की पुकार
मन
पर करो अधिकार
नहीं
तो जीवन हो जाएगा निस्सार
कामनाओं को मारों
रचनाओं को संवारो
न
अप्राप्ति पर उपजेगा क्षोभ
न
प्राप्ति के लिए जन्मेगा लोभ
न
कृत उपकार का होगा फलादेश
न
संतृप्ति देगा कोई व्यक्ति –
विशेष
न मन
होगा अनमना
न
छाएगा तमघना
आत्मा करेगी चाह उसी के आदेश की
उसी
के सन्देश की , उसी को उपदेश की
उसी
की दृष्टि की उसी की वृष्टि की
उसी
के नेह की , उसी के मेह की
उसी
के जुड़ाव की
अन्तिम पड़ाव की
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