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आओ मिल तर्पण करें
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निज
देश का श्रृंगार कर, अंगार पर जो चल दिए
जीवन
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मरण के प्रश्न सब निज प्राण देकर हल किए
जितना जिए सार्थक जिए, जीने का अर्थ सिखा गए
मर
कर भी जो मिटते नहीं ऐसे ही नाम लिखा गए
सम्बन्धियों से मोह त्यागा, देश पर क़ुर्बान थे
की
मृत्यु से शाश्वत सगाई, ऐसे वीर जवान थे
निज
रक्त के ही तिलक से उन्नत करे जो भाल को
है
धन्य धरती अंक में लेते हुए उस लाल को
रोली-महावर-बिन्दियाँ, सिंदूर भी धुलता रहा
पर
खून माँ की गोद की रज में वहा घुलता रहा
जो
वीरगति को पा गए, वे वीर सद् गति पा गए
माता-पिता के लाडले वे धीर सबको भा गए
उनकी
यशोगाथा लिखें क्या, शब्द भाषाहीन हैं
है
कण्ठ तो अवरुद्ध-सा, वाणी भी शब्द विहीन हैं
बस
भाव की अञ्जलि लिए कुछ सुमन ही अर्पण करें
भीगे नयन के बिन्दुओं से आओ मिल तर्पण करें
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