:: प्यार ::


प्यार शीतल भी है शीत की घाम है

है वसन्ती हवा फागुनी शाम है

प्यार मीरा है राधा का घनश्याम है

प्यार गंगा सा पावन परम धाम है


:: मेरा प्यार आप हैं ::


हूँ प्रीत आपकी मैं मेरा प्यार आप हैं

बाँधा है जिसने हमको वही तार आप हैं

छूटा जो साथ आपका टूटेगा साज़ भी

गुँजन है जिसकी मुझमें वो सितार आप हैं


:: जीवन चक्र ::


सुख-दुःख के चक्र में ही घूमती है ज़िंदगी

ख़ुशियों में बावरी सी झूमती है ज़िंदगी

माता-पिता को हर क़दम पे पूजते हैं जो

उनको क़दम-क़दम पे चूमती है ज़िंदगी


 
   
 
  मुक्तक
 
 

मुक्तक - 1

 
  मुक्तक - 2  
     
   
 

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