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प्रेम एक पावन झरना
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आजकल
बहुत बड़ी भ्रान्ति है
या
कहूँ कि समाज में घोर अशान्ति है
क्योकि देह को ही माध्यम समझने
लगें
है लोग प्यार की अभिव्यक्ति का
तन
के बिना अधूरा ही मानते हैं प्रेम
व्यक्ति से व्यक्ति का
उनके
अनुसार
जब
तक तन नहीं होते एकाकार
प्रेम पा ही नहीं सकता गगन सा विस्तार
वे
कहते हैं प्यार हैं जलन
प्यार हैं चुभन
प्यार हैं मिलन
प्यार हैं बिछुड़न
प्यार है कामनाओं की पूर्ति
यानि
शारीरिक इच्छाओं की आपूर्ति
पर
हमारी मान्यता है भिन्न
भले
ही लोग हो जाएं हमसे खिन्न
पर
सच मानिए ऐसा प्रेम, प्रेम नहीं
ये
है एक मानसिक विकार
या
कामनाओं का ज्वार
तन
हो ही नहीं सकता प्रेम का आधार
ये
तो अन्तर्मन में बहता एक पावन झरना है
जिसे
झर - झर –
झर झरना है
अन्तर्रात्मा को संतृप्त करना है
ऐसे
भी कह सकते है कि प्रेम
अन्तस्तल में बहती पावन नदी है
व्यर्थ ही भ्रमित इक्कीसवीं सदी है
इसलिए र ध न नहीं कोमल स्वर में गाइए
रे ध
नि यानि प्यार की सरगम |