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एक दिन हमें
ब्रह्मा जी मिले
हमारे मन में
आशा के फूल खिले
तुरत ही साष्टांग
प्रणाम किया
प्रसन्न हो
चरणामृत लिया
फिर दुःख से
द्रवित नारी हृदय
की पीड़ा सुनायी
प्रभो ! नारी-
पुरुष में
इतना भेद ?
किया तुम्ही ने
इसका है खेद
पुरुष का मन
इतना चंचल बनाया
कि पतिव्रता का भी
आँचल न भाया ?
पत्नी तो उसकी
अचल सम्पत्ति है
जो चल दे
अधर में तो
होती विपत्ति है |
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जानते हो तुम भी
पुरुष मन की गहराई
भंग करने
विश्वामित्र की
तपस्या मेनका
बुलाई ?
स्वर्ग में क्यूँ
अप्सराएँ
रखते हो ?
देवताओं की
पत्नियों से भी
नहीं डरते हो ?
सृष्टि की रचना
का यह सिस्टम
न भाया
क्यों अपनी रचना
में प्रश्न
चिन्ह लगवाया
स्वर्ग में भी
सुरापान
करवाते हो ?
सुरा और सुन्दरी
का मेल
कराते हो ?
फिर जगत् के |