:: उड़वाती खिल्ली ऐसी है दिल्ली ::


 

 

एक दिन

हमारी सहेली

ने हमसे पूछा

कि दिल्ली

जाते ही तुमने

विद्यालय में

साड़ी पहनना

ही छोड़ दिया ?

भारतीय परिधान

से अचानक ही

मुँह-मोड़ लिया ?

साड़ी तो

नारी की गरिमा है

भारत में

साड़ी की महिमा है

साड़ी ही

नारी का श्रृंगार है

भारत तो

साड़ियों का भंडार है

फिर तुम्हीं

 

बताओ कि अचानक

ये तुम्हें

क्या हो गया

तुम्हारे सारे

संस्कार कौन

धो गया

हमने कहा-

बातें तो

बहुत बढ़ी-चढ़ी

करती हो

क्या किसी

डी॰ टी॰ सी॰ बस में

भी चढ़ी हो ?

यहाँ दुःशासन

साड़ी नहीं खींचता

साड़ी खुद ही

खिंचती चली जाती है

लज्जा से द्रौपदी की

आँख मिंचती

चली जाती है

 

 
 
 

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