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एक बार
एक संयोजक
ने पूछा कि-
आप किस
रस में लिखती हैं ?
मैने कहा
करुण ही
मेरा प्रिय रस है
कहने लगे-
हास्य को क्यों
नहीं चुनतीं ?
क्या श्रोताओं की
तालियाँ नहीं सुनतीं ?
फिर करुण को
ही क्यों चुना है ?
हास्य का स्कोप
तो कई गुना है
मैंने कहा मंच की
सफलता के लिए
आत्मा को मारें ?
जीवन की शतरंज
में पैदल से हारें ?
क्या तालियों के
लिए विषय मोड़ दें ?
बेहतर है क्यों न
कलम तोड़ दें
अरे ! पीडा से द्रवित
होने पर ही तो |
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लेखनी चली है
सचमुच करुण
दृश्यों को देख
अगणित बार
मेरी आत्मा जली है
आप हास्य की
बात करते हैं
ताण्डव के समय
लास्य की बात
करते हैं ?
यदि हास्य ही
चाहिए तो
चुटकुले बजाइए
या किसी सर्कस से
जोकर बुलाइए
वैसे भी वर्तमान
भारत में
सर्वत्र आपको
हास्य नहीं दिखता है ?
चन्द पैसों की ख़ातिर
कितनों का ईमान यहाँ
हर रोज़ बिकता है
चलिए एक
विद्यालय दिखाते हैं
उसी में देश का
प्रतिबिम्ब दर्शाते हैं
हमारे यहाँ सभी |