:: यह तो कलम है जो काग़ज़ पर रोती ::


 

 

आज एक

महिला ने पूछा

जवानी में कविता ?

सच पूछो

बिल्कुल नहीं

फबता

क्यों यंग ऐज

बर्बाद कर रही हो ?

जीवन के सुनहरे

दिन कविता में

आबाद कर रही हो ?

बुढ़ापे में करना रचना

यंग ऐज में

इन झंझटों से बचना

मैंने कहा बुढ़ापे की

गारन्टी लोगी ?

क्या बुढ़ापे तक

इस हाथ में

इतनी ताक़त रहेगी

कि दिमाग़

जो कहे वह लिख दे ?

और क्या दिमाग़ में

 

भी इतनी ताकत रहेगी

कि वह हाथ से

सही लिखवाए ?

और सच पूछो

तो कविता की कोई

उम्र नहीं होती

यह तो कलम है

जो देश की

वर्तमान स्थिति

देख काग़ज़

पर रोती,

बार-बार कहती है

कि मेरी स्याही से उनके

चेहरे स्याह करो

जिन्होंने अपनी

स्याही से

तमाम लोगों

के जीवन में

स्याही भर दी

अत्याचारियों का

करो संहार कलम से

रचो नया संसार

 

 
 
 
     
   
 
     

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