:: कली बेवजह न छली जाये ::


 

 

हम बरेली से

दिल्ली कविता के

चक्कर में आये

यहाँ की भीड़-भाड़

देखते ही चकराये

ऐसा लगा कि

कविता कहीं

भाड़ में न

चली जाये

हमारे मन की

कली बेवजह

न छली जाये

हमें दूरदर्शन

पर लिखना था

हास्य-कवयित्री के

रूप में दिखना था

लेकिन हमारी

आँखें तो धूल

और धुएँ से

जलने लगीं

 

दौड़ती गाड़ियाँ

चेहरे पर कार्बन

मलने लगीं

हमने सोचा

केवल गाड़ियां ही

कालिख छोड़ें

तो हम

सह जाएँगे

लेकिन लोग

यदि इन्सानियत

से मुँह मोड़ें

तो हमारी

कल्पनाओं के

क़िले ढह जाएँगे

समय सौ की

स्पीड से रेस

करने लगा

हमें ऐब्नार्मल-सा

केस करने लगा

हमारे फेफड़े तो

 

 
 
 

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