:: कविता एक प्रेयसी  ::


 

 

एक दिन हमारे

मकान मालिक बड़े

रोष में आए

सप्तम स्वर

में चिल्लाए

या तो मकान

खाली कीजिए

या दस हज़ार

किराया दीजिए

किराया सुनते ही

हम चकराये

हमने कवि-सम्मेलनों

के चित्र दर्शाये

चित्रों को देखते ही

बोले कि अच्छा

तो आप

कविता लिखती हैं ?

दिखने में तो

ठीक ही दिखती हैं

पर ये कविता का

कीड़ा आपको क्यों

काट रहा है ?

हमने कहा-यहाँ

बड़े-बड़े कीड़े देश को

काट रहे हैं,

देश की सुनहरी किताब

दीमक की तरह

चाट रहे हैं

हम कविता

भी न कहें

गूंगे-बहरों की

तरह रहें

आप कविता को

कीड़ा बता रहे हैं

किराए के साथ-साथ

 

आप हमारी पीड़ा

भी बढ़ा रहे हैं

अरे ! कविता के

कीड़े का जन्म तो

समाज की पीड़ा

से होता है

और ये पीड़ा

आप जैसे सेठों के पेटों

में नहीं उठती

कविता तो केवल

दिल वालों को ही

छू पाती है

आपके

विचारों से तो ईंट-गारे

और पत्थर की

ही बू आती है

लगता है आपके

शरीर का

सबसे महत्वपूर्ण भाग

कहीं भाग गया है

और अभिमान

का कुंभकरण

सोते से जाग गया है

अरे ! कविता के

कीड़े में तो

वह शक्ति है जो

समाज के बड़े से बड़े

सर्प को भी डस

जाती है और

मन को छू जाने

वाली कविता

तो प्रेयसी की भाँति

सदा के लिए मन में

बस जाती है

 

 
 
 
     
   
 
     

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