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हमें दूरदर्शन पर
लिखने का प्लाट मिला
चार मिनट का समय
एलाट मिला
हम दूरदर्शन के
विषय में सोचने लगे
विचार मंथन के मध्य
आँख से
बहते आँसू पोंछने लगे
कि याद आया-
हमें तो
दर्शकों को हँसाना है
शब्दों के जाल में
फँसाना है
हम सीख
चुके थे
कि जनता को कैसे
बहलाया जाता है
और वक्त गुज़र
जाने पर कैसे
टहलाया जाता है
कि हमारी
आत्मा ने
हमें धिक्कारा
कवयित्रियाँ भी
हो गयीं नकारा
कविता के |
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नाम पर चुटकले
भले ही देश में
ज़हर घुले
कुछ देर हँसी का
बुलबुला
यही करता है
न चुटकुला
क्या-क्या परोसा
जा रहा है
सचमुच देश से
भरोसा जा रहा है
कहीं सुन्दरियों के
वस्त्र खुले-खुले
तो कहीं केवल
वस्त्र ही धुले-धुले
कहीं खाने का
अकाल
तो कहीं ‘हंग्री’
पियो मेरे लाल
कहीं दो मिनट में
भूख का खात्मा
तो कहीं भूख से
काँपती आत्मा
कहीं कचरे में |