:: पीड़ा पँहुचाने वाला कीड़ा ::


 

 

एक दिन

विद्यालय जाते समय

स्कूटर चलाते समय

बर्र ने

हम पर

प्रहार किया

एक ही आँख पर

कई जगह

वार किया

दर्द की तीव्रता

बढ़ते लगी

बर्र आँख पर

चढ़ने लगी

हम आँख

मलते ही

जा रहे थे

राहगीर हमें

अनदेखा कर

चलते ही

जा रहे थे

कई बार सोचा

चीख कर

किसी को पुकारें

फिर लगा क्यों

व्यर्थ सान्त्वना की

भीख का

मंत्र उचारें

वेदना कराह

रही थी

क्योंकि संवेदना

मर चुकी थी

आँख आँसुओं से

भर चुकी थी

ऐसा लगा कि

अब जीवन

शेष नहीं बचेगा

लेकिन सच

पूछिए तो अब

 

जीवन में

शेष बचा

ही क्या है

जब प्रेम दया

करुणा परोपकार

और लज्जा

जैसे शब्द

शब्दकोष में ही

आसीन रहेंगे

और लोग एक-दूसरे

के दर्द से इस तरह

उदासीन रहेंगे

तो जीवन कैसा,

मात्र रुपया, पैसा

डंक का दर्द तो

भाग चुका था,

लेकिन हमारा

आहत मन सोते से

जाग चुका था

वह पीड़ा

तो ज़हर घटने

के साथ

ही मिट गई,

लेकिन उपेक्षा

की पीड़ा का ज़हर

आज भी डंक मारता है

और मन बार-बार

यही वाक्य

उच्चारता है कि

स्थायी पीड़ा

पहुँचाने वाला कीड़ा

तो मनुष्य ही

कहलाता है

जो स्वार्थपूर्ति

के लिए कभी तो

डंक मारता है

कभी सहलाता है

 

 
 
 
     
   
 
     

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