:: ढाई अक्षर के आगे कलम झुक गई ::


एक दिन मैंने ख़ुद से मुलाक़ात की

बात क्या है बताओ मुझे राज़ की

 

मैंने पूछा तुम्हें ऐसा क्या हो गया

वो जो मन था तुम्हारा कहां खो गया

आइना देखकर मुस्कराती हो क्यूँ

प्यार के गीत नग़में ही गाती हो क्यूं

धुन नई सी लगे अब तो हर साज़ की

बात क्या है बताओ मुझे राज़ की

 

तुमको लगते हैं क्यूं अब नज़ारे हंसी

आसमां झूमता झूमती है ज़मीं

कुछ नए गीत दिल रोज़ गाने लगा

कौन है वो जो मन को लुभाने लगा

नींद उड़कर के जाने कहां खो गई

याद में आंख डूबी कलम धो गई

है अनोखी अदा अबतो अंदाज की

बात क्या है बताओ मुझे राज़ की

 

मैंने ख़ुद से कहां अब छिपायें तो क्या

न बतायें तो क्या

प्यार छिपता है क्या ? रोके रुकता है क्या ?


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