:: घोटालों की मार घपलों की भरमार ::


मतपेटी अब तो करती है नोटों की बौछार यहां

कैसे होंगे सुन्दर भारत के सपने साकार यहां

 

कहीं अमीरी बढ़ती जाती कहीं ज़िंदगी लड़ती जाती

महानगर में महाक्रूर हैं महानता से महादूर है

चौराहे हैं राह नहीं है निर्धन की परवाह नहीं है

कहीं बिखरते हीरे-मोती कहीं बुझ गई जीवन ज्योति

फ़ुटपाथों पर जीवन देखा अनगिन पृष्ठों का है लेखा

हर विकास में हम है आगे पर कितने हैं यहां अभागे

जाने कब मिल पाएगा सबको सबका अधिकार यहां

 

जब चुनाव के दिन आते हैं कैसे-कैसे फुसलाते हैं

अभिवादन के ढंग देखिए गिरगिट जैसे रंग देखिए

बड़े बड़े आश्वासन देते पर भरपेट न राशन देते

कचरा कोई कहीं बीनता अचरा कोई कहीं छीनता

घात करें प्रतिघात करें ये, दुराचार में मात करें ये

भूख ग़रीबी और बेकारी जनता है बेबस बेचारी

घोटालों की मार यहां है घपलों की भरमार यहां

 

भूले से न इन्हें छेड़िए भेड़ नहीं ये क्रूर भेड़िए

कितने बंगले कितने खाते फ़ार्म हाउस में रास रचाते

चलती अपराधों की चक्की देश की कितनी हुई तरक्की

पर उसमें पिसती है जनता है जवाब न इनके फन का

लूट मचाकर नाटक देखें भरी भीड़ में साड़ी फेंके

कितनी कुचल गई अबलाएं पर इनकी टल गई बलाएं

विश्वासों की हत्या करते करते अत्याचार यहां


 
     
     
     
     
     
     
     
 
     
   
 
     
 

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