:: आदर्शों के पाठ पढ़ाता जिसने हिंसा लादी है ::


कहने को आज़ाद हुए पर ये कैसी आज़ादी है

बेच-बेच कर देश खा रहा पहने वो जो खादी है

नेताओं के क़िले बन गए, कुर्सी के सिलसिले बन गए

साड़ी चप्पल जूते गहने, सम्पत्ति कितनी क्या कहने

घोटालों में देश रम गया, नेताओं का ख़ून जम गया

आस्तीन में विषधर पलते, जूते-कुर्सी-माइक चलते

भूख-प्यास में जनता तो आँसू पीने की आदी है

बेच-बेच कर देश खा रहा पहने वो जो खादी है

 

रिश्तों की भाषाएँ बदलीं, प्यार की परिभाषाएँ बदलीं

बातचीत के सुर बदले से, अपनों के भी उर बदले से

प्रेम-त्याग बस शब्दकोष में, छैयां छैयां जोश-जोश में

चलचित्रों के चित्र विषैले, गीत सुने नहले पर दहले

मिक्सिंग फिक्सिंग मैच हो रहे, गांधी बस स्कैच हो रहे

संस्कार सब लुप्त हो रहे, सत्ताधारी सुप्त हो रहे

वही अहिंसा-पाठ पढ़ाता, जिसने हिंसा लादी है

बेच-बेच कर देश खा रहा पहने वो जो खादी है

 


 
 

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