:: ढाई अक्षर के आगे कलम झुक गई ::


मैंने ख़ुद से कहा, प्यार में तू नहा

प्यार जैसी महक है कहीं भी नहीं

है जहां प्यार बस ज़िंदगी हैं वहीं

प्यार पे मैंने जब जितना ज़्यादा लिखा

प्यार उससे बड़ा उतना ज़्यादा दिखा

प्यार पे लिखते लिखते कलम रुक गई

ढाई अक्षर के आगे कलम झुक गई

दिल से चाहे कोई बात है नाज़ की

बात तुमको बताती हूँ मै राज़ की

 

मैंने ख़ुद से कहा अब कहें भी तो क्या

न रहें भी तो क्या

हम रहें ना रहें प्यार रह जायेगा

ईंट पत्थर का घर यूं ही ढह जायेगा

प्यार की ही इमारत बनाते हैं जो

प्यार के गीत नग़मे सुनाते हैं जो

प्यार की ही इबादत जो करते यहां

छोड़ जायें जहां वे हैं मरते कहां ?

कोई सानी नहीं है यहां ताज की

बात तुमको बता दी है ये राज़ की


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