:: कुर्सी ::


आज इधर है कल तक जाने किधर खिसकने वाली है

फ़ैविकोल का जोड़ ना समझें जल्दी हिलनेवाली है

जिसकी कुर्सी उसके जलवे चमचे चाट रहे हैं तलवे

चली ना जाए कुर्सी भय है कुर्सी की नित जय-जय-जय है

जबसे कुर्सी गई बेचारी हैं अदृश्य से अटल बिहारी

कोई कुर्सी त्याग रहा है कोई पीछे भाग रहा है

कुर्सी ने कालिख पुतवाई पर कुर्सी में रहे खुदाई

राष्ट्र शान्ति में बाधक कुर्सी है इतनी उन्मादक कुर्सी

जिसकी कुर्सी ईद उसी की होली और दिवाली है

फ़ैविकोल का जोड़ न समझें जल्दी हिलनेवाली है

रंग बदलती कुर्सी पलपल न समझें तो कुर्सी दलदल

कुर्सी के क़िस्से अनन्त हैं, कुर्सी के हिस्से अनन्त है

कुर्सी के पीछे अपराधी कुर्सी के नीचे अपराधी

कुर्सी से मुख कौन मोड़ता सत्ता का सुख कौन छोड़ता

सुरा सुन्दरी भी दिलवाती अच्छों-अच्छों को हिलवाती

कुर्सी से है भाल दमकता फटे हाल बेहाल चमकता

निखरा निखरा रुप-रंग है अब गालों पर लाली है

फ़ैविकोल का जोड़ ना समझे जल्दी हिलनेवाली है

कुर्सी गठबन्धन करवाती कुर्सी ही क्रन्दन करवाती

कुर्सी से होता अभिनन्दन कुर्सी ही करवाती वन्दन

कुर्सी माता कुर्सी त्राता कुर्सी मानों बनी बिधाता

कुर्सी बन्धु कुर्सी बहना कुर्सी की गाथा क्या कहना

कुर्सी ही तो इष्ट मित्र है कुर्सी की महिमा विचित्र है

कुर्सी सबसे ज्यादा प्यारी पत्नी भी इसकी अधिकारी

हम भी फ़िट बैठे कुर्सी पर फ़िट अपनी घरवाली है

फ़ैविकोल का जोड़ न समझें जल्दी हिलनेवाली है ।


 
     
     
     
     
     
     
     
 
     
   
 
     
 

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